सोमवार, 25 सितंबर 2017

परिवार को ढालते हैं अपनी कृतियों में आर्टिस्ट दास

परिवार को ढालते हैं अपनी कृतियों में आर्टिस्ट दास
मूमल नेटवर्क, जयपुर। आर्टिस्ट एच. आर. दास की पेंटिंग्स व स्कलपचर्स से सजी सोलो एग्जीबिशन कल आईसीए गैलेरी में शुरू हुई। एक माह तक चलने वाली इस प्रदर्शनी का उद्घाटन मुख्य अतिथी सुधीर कासलीवाल ने किया।

आर्टिस्ट ने अपनी कृतियों के बारे में बताते हुए कहा हकि विवाह से पहले मैं अकेवल बैलों को चित्रित करता था। अब विवाह पश्चात मैनें अपनी कृतियों में गाय व बछड़े को शामिल करके परिवार की संज्ञा को पूर्ण किया है। दास की इस प्रदर्शनी में 25 पेंटिंग्स व कुछ स्कलपचर्स सजाए गए हैं। दास की बनाई कृतियों में रंगों का समायोजन उनके रूपाकारों को प्रभावशाली बनाता है।

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

मोनो आर्ट ग्राफिक आर्ट वर्कशॉप 24 से

मोनो आर्ट ग्राफिक आर्ट वर्कशॉप 24 से
प्रिंटेड पिक्चर पर सेमीनार 23 को
मूमल नेटवर्क, जवाहर कला केन्द्र के ब्राफिक आर्ट स्टूडियो में मोनो आर्ट ग्राफिक आर्ट वर्कशॉप का आयोजन किया जा रहा है। 24 से 26 सितम्बर तक आयोजित होने वाली इस वर्कशॉप में कविता शाह द्वारा प्रतिभागियों को मोनो आर्ट ग्राफिक की बारीकियां सिखाई जाएंगी। वर्कशॉप में भाग लेने के लिए रुपये 2000 की फीस रखी गई है।
कल 23 सितम्बर को केन्द्र के रंगायन में प्रिंटेड पिक्चर पर सेमीनार का आयोजन किया गया है। यह सेमीनार तीन सेशन में होगी।

सेन फ्रांसिस्को में सजेंगी महावीर स्वामी की कृतियां

सेन फ्रांसिस्को में सजेंगी महावीर स्वामी की कृतियां
कृतियों की बारीकी के गुण सिखाएंगे कार्यशाला में
मूमल नेटवर्क, बीकानेर। मुगल व राजस्थानी शैली के सशक्त हस्ताक्षर महावीर स्वामी की कृतियों का प्रदर्शन सैन फ्रांसिस्को में लगने वाली एकल प्रदर्शनी 'मोहरी' में 4 से 22 अक्टूबर तक होगा। इस अवसर पर आयोजित कार्यशालाओं में महावीर जर कला प्रेमियों को अपनी कृतियों की बारीकी से अवगत कराएंगे।
7 से 10 अक्टूबर तक कार्यशाला 'आस्था गणेश' का आयोजन किया जाएगा। 12 से 14 अक्टूबर तक ्रस्क्च्रज्ह्य की 23वीं वार्षिक मीटिंग व कान्फ्रेंस का आयोजन होगा। और कार्यक्रम की समाप्ति पर 20 व 21 अक्टूबर को कार्यशाला 'मुगल बोटेनिकल आर्ट वर्कशॉप' में कला रसिक मुगल शैली का अन्दाज सीखेंगे।

स्पन्दन में शिव सोनी की बाल कृतियां

स्पन्दन में शिव सोनी की बाल कृतियां
मूमल नेटवर्क, जयपुर/मुम्बई। इण्डियन आर्ट प्रमोटर की तरफ से आयोजित कला स्पन्दन आर्ट फेयर में जयपुर के युवा कलाकार शिव कुमार सोनी की बचपन पर आधारित कृतियां प्रदर्शित की जा रही हैं। मुंबई के नेहरू सेन्टर में कल शाम 4 बजे इसका वीआईपी प्रिव्यू शो आयोजित किया गया। आज 22 सितम्बर ये 24 सितम्बर तक दर्शक इस प्रदर्शनी का आनन्द ले सकेंगे।
शिव कुमार सोनी ने बताया कि, अपने बचपन की यादों को मैं अपने चित्रों में समेटना चाहता हूं। रंगीन पतंगे, शांत पक्षी, बादलों में रबनती चनात्मक डिजाइन,  बरसात के धुंधलके वाला वाला ग्रे आकाश, यह सब कुछ मैंने चित्रों में शामिल किया है।
कैनवास पर एकगेलिक रंगों से बनी शिव सोनी की कृतिया आकर्षक हैं जो सहज ही अपनी ओर खींचती हैं। अपने कृतियों के बाल चेहरे को इन्होने 'पुप्पी' नाम दिया है।

वृन्दाबन की सांझी कला: एक कला परम्परा

वृन्दाबन की सांझी कला: एक कला परम्परा
(यूं तो भारत के प्रत्येक प्रांत में कला के विभिन्न रूप संस्कृति को जीवन्त करते हैं। लेकिन कुछ कलाओं, उनकी प्रस्तुति व उनके प्रदर्शन का समय उन्हें अति विशिष्ट की श्रेणी में ले आता है। वुंदावन की सांझी कला इनमें से एक है। इस लेख में सांझी कला की कुछ जानकारियां दी जा रही हैं-सं.)

वृंदावन स्थिति श्री मदनमोहन जी के मंदिर जो कि भट्टजी के मंदिर के नाम से प्रसिद्द है में 350 वर्ष पुरानी सांझी कला का आयोजन ना केवल एक परम्परा के रूप में किया जा रहा है बल्कि ये एक सेवा का वार्षिक अंग भी है जो कि श्राद्धपक्ष में एकादशी से अमावस्या तक प्रतिवर्ष किया जाता है।
लोककथाओं के अनुसार सांझी श्रीराधा द्वारा शुरू की गई कला भी मानी जाती है, जिन्होंने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए फूलों, पत्तियों और रंगों और रंगीन पत्थरों के साथ प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करते हुए विविधवर्णी रंगोली का प्रारूप बनाया और श्रीकृष्ण की कृपा को प्राप्त किया। वर्तमान में भी यह परम्परा बृज संभाग में कुवांरी कन्यायें निभाती हैं। वे सांझी का निर्माण करके अपने लिए अच्छे जीवनसाथी को पाने की कामना करती है।
सांझी शब्द हिंदी शब्द संध्या से लिया गया है, शाम के समय कला में सेवा भावना का एक अद्भुत रूप देखने को मिलता है। वृन्दाबन की सांझी कला का प्रदर्शन मिट्टी के चबूतरे पर स्टैंसिल की सहायता से सूखे रंगों से किया जाता है। यह मिट्टी के चबूतरे चोकोर, छैकोर और आठकोर वाले बनाये जाते हैं।

दंगली सांझी
भट्टजी के मंदिर की सांझीकला आठकोर वाले चबूतरे में बनायीं जाती है जिसको सांझी की भाषा में उस्तादी या दंगली सांझी कहा जाता है। यहाँ की सांझी में बेल और लपेट जिसको सांझी की भाषा में नक्शा या लपेटा कहा जाता है का संयोजन अद्वितीय है जिसमें एक बेल से लेकर 108 बेल तक का लपेटा यहाँ की शुद्ध पारंपरिक रचना है जो पूर्णत: ज्यामिति के मूल सिद्धांतों पर आधारित है। इसके तहत त्रिकोण, चतुष्कोण, वर्ग, षटकोण, पंचभुज, गोले, सकलपारा, स्टार, अंटा, चोपड़, लालटेन, आले, सर्वव्यापक इत्यादि बेलों का निर्माण किया जाता है।
नक़्शे में बेलों की चाल यानि गति को दबाब और उछाल के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि हर बेल एक बार दूसरी बेल के नीचे जाती है जिसको सांझी की भाषा में दबाब कहा जाता है और फिर किसी दूसरी बेल के ऊपर आती है जिसको उछाल कहा जाता है। नक़्शे की पूर्णता या शुद्धि बेलों के एकबार उछाल और फिर एक बार दबाब की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति से मानी जाती है, बेलों के लगातार दो बार उछाल या दबाब की स्थिति में नक़्शे को अपूर्ण या अशुद्ध माना जाता है।
नक़्शे की सुंदरता उसकी सर्वव्यापकता यानि चारों और से उसकी समरूपता से मानी जाती है, बेल की चाल में हर एक जैसे स्थान पर फूल की जगह फूल और पत्ती की  जगह पत्ती से होती है, प्रत्येक बेल में उसकी चस यानि अंतरिम रंग संयोजन और बाहरी सफेद लाइन जिसको पछेली कहा जाता है नक़्शे की सुंदरता में चार चाँद लगा देते हैं। नक़्शे का बाहरी सिरा एक मोटी बेल जिसको बोर्डर कहा जाता है से सुसज्जित किया जाता है।

पौराणिे कथाओं का चित्रण
सांझी के मध्य में भारतीय पौराणिक कथाओं को कई रूपों में चित्रित किया जाता है, जिसमें श्रीकृष्ण और श्रीराम की लीलाओ  को मुख्य रूप से स्थान दिया जाता है। समस्त रचनाएँ श्रीमद्भागवत, रामायण, गीता, वेद, उपनिषद और धार्मिक कवियों की रचनाओ जिसको वाणी कहा जाता है से सम्बंधित होती हैं। पिछले 50 वर्षों के दौरान कुछ प्रसिद्ध सांझी रचनाएँ नवधा भक्ति, कृष्णजन्म, गोपीगीत, वेणुगीत,अष्टसखी मंडल, रामलीला, दशवतार, गौचारन, अष्टयाम, अष्टसखा, अहिल्या उद्धार, शयनलीला, रासलीला, माखनचोरी, पनघट, होरी, वंशीशिक्षा, इंद्रमानभंग, गोवर्धनलीला इत्यादि हैं। यही कारण है कि भट्टजी की सांझी कला को आध्यात्मिक अभिव्यक्ति की बेहतरीन कला भी माना जाता है जो कि ठाकुरजी की अष्टयाम वार्षिक सेवा का एक महत्वपूर्ण अंग है।

सिमटता कला कौशल
सांझी का निर्माण अत्यधिक श्रमसाध्य होने के फलस्वरूप वर्तमान में ये कला देश में केवल कुछ मंदिरों तक ही सीमित रह गयी है। लेकिन भट्टजी की सांझी कला को उनके परिवार की सोलहवीं पीढ़ी न केवल पारंपरिक सांझी के सिद्धांतों के अनुसार कर रही है बल्कि उनके द्वारा किया जा रहा कला में समसामयिकता का समावेश भी काबिले तारीफ़ है। भट्टजी की सांझाी कला का कमाल है कि देश विदेश से आये शोधकर्ता एवं कलामर्मज्ञ भट्ट जी के द्वारे आए बिना अपनी कला यात्रा को पूर्ण नही मानते।

विदेशी कलाकारों की सांझी कला भक्ति
लंदन की विश्वविख्यात फोटोग्राफर रोबिन बीच ने लगभग दो दशक तक वृन्दावन में रहकर सांझी की फोटोग्राफी की और उनकी प्रदर्शनीयाँ लगाईं वहीँ अमेरिका के मूल निवासी लेखक और आर्ट प्रमोटर असीम कृष्णादास ने तीन दशक तक वृन्दाबन में रहकर सांझी पर एक बहुचर्तित किताब भी लिखी है जिसका नाम इवनिंग ब्लॉसम है। जापानी रिसर्च स्कॉलोर तकाको असानो और अमेरिका के जॉन शेरतनो हौलेय ने भी अपनी रिसर्च में जगह जगह पर सांझी कला का उल्लेख किया है।

सांझी के रूप
सांझी कला का प्रदर्शन पानी के ऊपर और पानी के नीचे भी अति लोकप्रिय है जिसमें प्राय: नागलीला और एक या दो चसी स्टैंसिल को प्रयोग में लाया जाता है। इसी तरह कहीं कहीं पर फूलों और रंगीन कपड़ों का प्रयोग भी सांझी का ही एक प्रकार माना गया है इसमें बिभिन्न प्रकार के फूलों को विपरीत रंगों के कपड़ों के ऊपर सजाया जाता है और केंद्र में कैलेंडर के चित्र को रखकर सांझी पूजा की जाती है।
भट्टजी की सांझी कला का प्रदर्शन देश एवं विदेश के कई स्थानों एवं गैलरीज में हो चुका है इनमें से कुछ नाम माटीघर इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आट्र्स नई दिल्ली, कोलंबिया यूनिवर्सिटी, लंदन गैलरी ऑफ़ आट्र्स, राष्ट्रीय कला केंद्र सिंगापुर, आर्ट सेंटर जॉर्जिया, जयपुर आर्ट समिट जयपुर प्रमुख हैं।

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

नेशनल आर्ट एग्जीबिशन में प्रविष्टियां आमन्त्रित

नेशनल आर्ट एग्जीबिशन में प्रविष्टियां आमन्त्रित
प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप की प्लेटिनम जुबली अवसर पर आयोजन
श्रेष्ठ कृतियों को नकद पुरस्कार
मूमल नेूटवर्क, गुलबर्गा (कर्नाटक)। प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप की प्लेटिनम जुबली के अवसर पर इण्डियन रॉयल अकंडमी ऑफ आर्ट एण्ड कल्चर द्वारा नेशनल आर्ट एग्जीबिशन का आयोजन किया जा रहा है।
भारत के सभी आर्टिस्टों की कृतियों को इस प्रदर्शनी के लिए आमन्त्रित किया गया है। चुनी गई श्रेष्ठ 6 कृतियों को 5-5 हजार रुपए के नकद पुरस्कार से प्रथम पुरस्कार के रूप में नवाजा जाएगा। द्वितीय पुरस्कार के रूपमें 6 कृतियों को मेरिट सर्टिफिकेट अवार्ड प्रदान किया जाएगा।
कमसे कम एक गुणा एक तथा अधिकतम तीन गुणा तीन फीट की कृतियां स्वीकार की जाएंगी। प्रविष्टि भेजने की अन्तिम तिथि 30 सितम्बर है।

पोस्टर्स में साकार हुआ जन-मन-गण


पोस्टर्स में साकार हुआ जन-मन-गण
हिन्दी दिवस समारोह सम्पन्न
मूमल नेटवर्क, जयपुर। 14 व 15 सितम्बर को हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी एवं राजस्थान ललित कला अकादमी केे संयुक्त तत्वाधान में दो दिवसीय समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर कला विद्यार्थियों ने पोस्टर्स के जरिए अपनी देश भक्ति का इजहार किया वहीं कला एवं संस्कृति में हिन्दी की भूमिका जैसे विषयों पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
14 सितम्बर का आयोजन ललित कला अकादमी परिसर में किया गया जहां पर लगभग 50 कला विद्याार्थियों ने रंगों से जन-गन-मण को साकार करते हुए पोस्टर्स बनाए। इसके साथ ही  डॉ. राजेश व्यास ने कला एवं संस्कृति में हिन्दी की भूमिका विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। 15 सितम्बर को राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी में संगोष्ठि का आयोजन किया गया।
अपने व्याख्यान में बोलते हुए  डॉ. राजेश व्यास ने कहा कि, कला के मर्म तक पहुंचने के लिए हमें हिन्दी भाषा व हमारी संस्कृति को अपनाना होगा, आत्मसात करना होगा। नृत्य की अक्षि, चित्रकला की दृष्टि तथा कला की आत्मा को समझने के लिए हमेेंं हमारी भाषा की महत्ता को स्वीकारना होगा। आज ऑक्सफॉर्ड  में नए शब्दों का संकलन हिन्दी से ही किया जा रहा है। हिन्दी इसलिए सम्पन्न है क्योकि समस्त प्रादेशिक भाषाओं ने उसे रक्त संचार दिया है। भाषा के मर्म में प्रवेश कर ही कला में प्रवेश किया जा सकता है।

इस अवसर पर बोलते हुए राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी की निदेशक डॉ. अनीता नायर ने कहा कि अंग्रेज यह अच्छी तरह जानते थे कि किसी को लम्बे समय तक दास बनाने के लिए हमेंं उसकी भाषा पर आधिपत्य जमाना होगा और उन्होंने भारत की शिक्षा को आंग्ल भाषा की
बैसाखी पकड़ा दी। इस लिए हम आज मानसिक रूप सेे पंगु हो चुके हैं। यही कारण है कि हम इस छोटी सी बात को भी नहीं समझ पा रहे हैं कि हमारा सर्वांगीण विकास निज भाषा हिन्दी के माध्यम से ही संभव है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही सह-आचार्य डॉ. उर्वशी शर्मा ने अपनेे संबोधन में कहा कि, आज हिंदी दिवस नहीं हमारी भारतीय भाषाओं का दिवस है कलाओं के मर्म तक पहुंचने के लिए हमें अपनी भाषाओं से जुडऩा होगा।
अन्त में राजस्थान ललित कला अकादमी के अध्यक्ष डॉ. अश्विन दलवी ने समस्त अतिथियों एवं उपस्थित जनों का आभार व्यक्त किया।